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Tandav and Lasya ( Origin of dance ) in hindi

Tandav and Lasya

Tandav and lasya is the origin of dance and we will learn about the information related to Tandav and lasya like what is Tandav dance and what is Lasya dance?

Tandav

According to the Indian tradition, Bhagwan Shankar has been considered as the deity of dance. Shivji dances daily in his full of fun in the evening. All the people are involved in this joy and dance of Shiva. In this great joy dance, Brahma Ji gives rhythm, Vishnu Ji plays the mridang, Mata Saraswati Ji taunts her veena, Surya-moon flutes flute, Apsaras and eunuchs take care of the devotees, Nandi plays the drum and Bhrigi plays the Mandal Narada Ji mixes with them. The constellation of the earth moves with the movement of the earth and hands by the footsteps of Shiva. That is why it has been said, “The world is dancing”. This whole world is dance.

Tandav and lasya

The postures were invented by Shiva in dance in this way and the tandumuni (nandishvara) of the postures were compiled one by one and began to practice them sitting in rhythm. When Bharatmuni with the permission of Brahmaji presented the drama named “Tripurdah” with his troupe to Shiva on the Mount of Kailash – then Lord Shankara suggested planning the dance in this drama experiment and ordered his beloved disciple TanduMuni Gave them to impart dance education to Bharata Muni.

Bharata-Muni

Thus the “Tandav” dance of Shiva became famous due to the teachings by Tandu. BharataMuni taught this dance to his sons. So this dance was propagated in Bhu-lok. Similarly, in the fourth chapter of his book Natyashastraam, Bharata Muni has described the characteristic of Tandav dance.

The dance in which every such dance, with the emotion of veer, vibhats, raudra, adhbhut, etc., which is worthy of men to perform, is called Tandav dance. Fast preparation has special significance in this dance. The movement of the post takes place at a very fast pace and according to that, the organs are also charged fully. Strong words like Dhadan, Tadhan, Thanga, Dhetta, Dhumkit, etc. are also used in its lyrics. In Kathak dance, the paran of the Pakhavaj is danced with this Tandava postures.

Types of Tandav Dance

According to which Lord Shiva conceived this dance form because he was very fond of dancing. Shiv’s Tandava is embellished with 108 Karanas and 32 embers. In ancient texts, the Tandava also finds mention of many distinctions. The seven distinctions of Tandava are explained.

1. Anand Tandava – Lord Shiva performs Tandava with bliss.
2. Tripura Tandava – Dance performed by Lord Shiva after killing Tripurasura signifies courage (valor) and extreme anger (raudra)
3. Sandhya Tandava- Tandava performed in the evening is in a sweet mood
4. Sanhar Tandava – The destruction of the entire universe is repeated in the massacre Tandava
5. Kalika Tandava – To destroy evil, Shiva dances expressing his Bhairava form
6. Uma Tandava – This dance form represents conjugated affection, love, and attraction in its present and simple form.
7. Gauri Tandava – Shiva and Gauri danced together in Shringara Ras in this Tandava.

Lasya

Mata Parvati, inspired by the dance of Shiva, composed a dance that was composed of sugary tunas. It is said that after the demon Tripurasura was killed by Lord Shiva, he danced the Tandava in anger, then to appease and pacify him, Goddess Parvati Ji performed a soft and adorned dance called “Lasya” dance.

This dance expresses happiness and is filled with grace and beauty. He taught this dance to Usha, the daughter of Banasura. Usha was married to Anirudh, grandson of Lord Krishna. Then on coming to Dwarka, Usha taught that dance to the women there. In this way, the lasya dance performed by Parvati Ji arrived on the earth.

In this dance, every such elegant dance which is capable of performing sukomal postures with emotions of shringar, Karun, etc. which is worthy for women to perform, is called Lasya Natya. In this, the organs are operated with great softness and beauty. The postures of neck, eye, eyebrow, wrist, etc. are also operated on with great cleverness. in this dance the chalan is performed very beautifully and the expressions are displayed with softness. Its music is also melodious.

Three distinctions of Lasya

In Kathak dance, gata, thumri, and kavitta are danced with this lasya dance. Similarly, there are three distinctions of Lasya –

1. Vikat lasya – A dance form in which the rhythm, speed, the gesture is performed, which is known as Vikat lasya

2. Visham lasya – Chakkars, Bhramri, and special footwork is performed

3. Laghu Lasya – By generating sound on the earth through the anklet, the malformed design, laghu lasya is performed.

Thus we see that in Indian tradition, dance is divided into two parts tandav and lasya. In Tandava, the enthusiasm and vigor of man appear. In this dance, a mixture of versatility is performed with great beauty in the background of Seriousness. Whereas lasya is a Soft dance and performed by women in the performance of soft expressions. Tandava and lasya forms can be seen differently in each dance form of India. today we will learn about the information related to Tandav and lasya.

Tandav and lasya in Hindi / ताण्डव और लास्य (नृत्य की उत्पत्ति कथा)

नमस्कार आज हम जानेगे नृत्य की उत्पत्ति कथा और तांडव लास्य से जुडी जानकारी जैसे तांडव नृत्य क्या है और लास्य नृत्य क्या है इनके कितने भेद होते है

ताण्डव 

भारतीय परम्परा के अनुसार नृत्य के आदि-देवता भगवन शंकर को माना गया है। शिवजी  रोज संध्याकाल में अपनी मस्ती में झूमकर नाचते हैं। शिव के इस आनन्द-नर्तन में सभी जन  सम्मिलित होते हैं। इस विराटता आनन्द-नर्तन में ब्रह्मा जी ताल देते हैं, विष्णु जी मृदंग बजाते हैं, माता सरस्वती जी अपनी वीणा झंकृत करती है, सूर्य-चन्द्र बांसुरी फूंकते हैं, अप्सराएं और  किन्नरियां श्रतियों का ध्यान रखती हैं, नन्दी डमरु बजाते है और भृगी मांदल बजाते है। इनके साथ नारद जी स्वर मिलाते हैं। शिवजी के पद-घातों से पृथ्वी और हाथों के संचालन से नक्षत्र-मण्डल गतिमान होता है। इसीलिए कहा गया है “नृत्यमयं जगत्” यह सारा संसार ही नृत्यमय है। 
शिवजी ने इस प्रकार नृत्य करते हुए जिन मुद्राओं का आविष्कार किया और मुद्राओं का तण्डुमुनि (नन्दीश्वर) एक-एक कर संकलित करते गए और उन्हें लय-ताल में बैठाकर अभ्यास करने लगे। जब ब्रह्माजी की आज्ञा से भरतमुनि ने  “त्रिपुरदाह” नाम का नाटक अपनी मंडली के साथ कैलाश पर्वत पर जाकर शिवज के समक्ष – प्रस्तुत किया तब  भगवान  शंकरने इस नाट्य प्रयोग में नृत्य की योजना करने का सुझाव दिया

तण्डु मुनि

इसी प्रकार उन्होंने अपने प्रिय शिष्य तण्डु मुनि को आदेश दिया कि वे भरत मुनि को नृत्य-शिक्षा प्रदान करें। इस प्रकार तण्डु के द्वारा सिखाए जाने के कारण शिवजी का “ताण्डव” नृत्य प्रसिद्ध हुआ । भरत मुनि ने इस नृत्य की शिक्षा अपने पुत्रों को दी। जिससे यह नृत्य भू-लोक में प्रचारित हो गया था। इसी प्रकार भरत मुनि ने अपनी ग्रंथ नाट्यशास्त्रम के चौथे अध्याय में तांडव नृत्य की विशेषता का वर्णन किया हे। 
जिस नृत्य में वीर, वीभत्स, रौद्र, अद्भुत आदि रसों से युक्त ऐसा प्रत्येक नृत्य जो पुरुषों के करने के योग्य हो वह ताण्डव नृत्य कहलाता है। इस नृत्य में तेजी-तैयारी का विशेष महत्व होता है। पद-संचालन अत्यन्त तीव्र गति से होता है और उसी के अनुरूप अंगों को भी आवेश पूर्ण रीति से चलाया जाता है। इसके बोलों में भी धड़न, तड़न, थंगा, धेत्ता, धुमकिट आदि जोरदार शब्दों का प्रयोग किया जाता है। कथक नृत्य में पखावज की परने इसी ताण्डव अंग से नाची जाती है।

तांडव नृत्य के प्रकार

जिसके अनुसार भगवान शिव ने इस नृत्य रूप की कल्पना की थी क्योंकि उन्हें नृत्य करने का बहुत शौक था।शिव का तांडव 108 करणों और 32 अंगारों से सुशोभित है। प्राचीन ग्रंथों में ताण्डव कई  भेदों का भी उल्लेख प्राप्त होता है। ताण्डव के सात भेद बताए गए  हैं-
1. आनन्द ताण्डव  – भगवान शिव जो आनंद से तांडव करते हैं।
2. त्रिपुर ताण्डव – भगवान शिव द्वारा त्रिपुरासुर को मारने के बाद किया गया नृत्य साहस (वीरता) और अत्यधिक क्रोध (रौद्र) को दर्शाता है
3. संध्या ताण्डव- शाम को किया जाने वाला तांडव मधुर मनोदशा में होता है
4. संहार ताण्डव  – सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का विनाश संहार तांडव में दोहराया जाता है
5. कालिका ताण्डव- बुराई को नष्ट करने के लिए, शिव अपने भैरव रूप को व्यक्त करते हुए नृत्य करते हैं
6. उमा ताण्डव- यह नृत्य रूप अपने वर्तमान और सरल रूप में संयुग्मित स्नेह, प्रेम और आकर्षण का प्रतिनिधित्व करता है
7. गौरी ताण्डव – इस तांडव में शिव और गौरी ने श्रृंगारा रस में एक साथ नृत्य किया

लस्या

माता पार्वती ने शिवजी के नृत्य से प्रेरित होकर एक नृत्य की रचना की जो की सुकोमल अंगहारों से युक्त था। कहते हे भगवान शिव द्वारा राक्षस त्रिपुरासुर के मारे जाने के बाद,उन्होंने क्रोध में तांडव नृत्य किया तब उन्हें  प्रसन्न करने और शांत करने के लिए देवी पार्वती जी ने एक नरम और शृंगारिक नृत्य किया जो की “लास्य” नृत्य कहलाया। यह नृत्य खुशी व्यक्त करता है और अनुग्रह और सुंदरता से भर होता है। इस नृत्य की शिक्षा उन्होंने बाणासुर की पुत्री उषा को दी। उषा का विवाह भगवान कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध से हुआ। तब द्वारका आने पर उषा ने वह नृत्य वहां की स्त्रियों को सिखाया। इस प्रकार पार्वती जी का चलाया हुआ लास्य नृत्य पृथ्वी पर अवतरित हुआ।
इस नृत्य में  श्रृंगार, करुण आदि रसों से युक्त सुकोमल अंग संचालन वाला ऐसा प्रत्येक लालित्यपूर्ण नृत्य जो स्त्रियों के किये जाने के योग्य हो वह लास्य नत्य कहा जाता है। इसमें अंगों का संचालन अत्यन्त सुकमारता एवं सुन्दरता के साथ किया जाता है। ग्रीवा, नेत्र, भ्रू, कलाई आदि भी बड़ी चतुरता के साथ चलाई जाती है। इस नृत्य में पेरो का चलन बहुत ही खूबसूरती से किया जाता है और भावों को कोमलता के साथ प्रदर्शित किया जाता है। इसका संगीत भी सुमधुर होता है।

लस्या के तीन भेद

कथक नृत्य में गते, ठुमरी व कवित्त इसी लास्य अंग से नाचे जाते हैं। इसी प्रकार लास्य के तीन भेद हैं-
1.विकट लास्य  – नृत्य शैली जिसमें लय, ताल, भाव का प्रदर्शन किया जाता है, जिसे विकट लास्य कहा जाता है

2.विशम लास्य – चक्कर,भ्रमरी तथा विशेष फुटवर्क का प्रदर्शन किया जाता है

3.लगु लस्य – पायल के माध्यम से पृथ्वी पर ध्वनि उत्पन्न करके, कुंचित पदविन्यास, लगु लस्य का प्रदर्शन किया जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय परम्परा में नृत्य दो भागों में विभक्त है। ताण्डव में पौरुष का उत्साह व ओज प्रकट होता है। इस नृत्य में गम्भीरत की पृष्ठभूमि में चंचलता का मिश्रण बहुत सुन्दरता के साथ किया जाता है। जबकि लास्य सुकुमार नृत्य है और कोमल भावों के प्रदर्शन में स्त्रियों द्वारा प्रस्तुत किय जाता है। भारत की प्रत्येक नृत्य शैली में ताण्डव व लास्य रूपों को अलग-अलग देखा जा सकता है।

2 Comments

  1. शिव योगी

    बहुत आवश्यक जानकारी आपने उपलब्ध कराई है ।एक बात सामान्यतः पाई जाती है कि तांडव नृत्य तो भोले बाबा का ही है बहुत जटिल और रपटिल है, फिर भी उन्मादी नर्तन करते हैं ।लास्य नृत्य को सोबर कहा जाता है ।कुछ लोक नृत्य में स्त्री पुरूष संयुक्त नृत्य करते हैं और विलग रहकर भी, किन्तु दोनो नृत्यों के मिश्रण पर ही समाहार होता है ।

    शुभम् अति शुभम् ।

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