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Mohiniyattam Dance – History and Evolution

Introduction of Mohiniyattam Dance

The new dance form that came to light from the combination of the Devadasis of Tamil Nadu and the Nangyars of Kerala was called ‘Mohiniyattam’. Devadasia knew the lasya-dominant dance with gentle gestures and the namayars were only pathetically afflicted, so the art of Mohiniyattam was amalgamated. From the 13th to the 18th century, the slaveholding of the Devadasis gradually declined and the word Devadasi became a prostitute.

In the first half of the nineteenth century, Mohiniyattam dance-style came to special light by Maharaja Swati Tirunal of Travancore (Trivandrum). He also composed 50 Padams and many varnams for this genre. This dance form of the Kerala region is dominated by dakhari songs and music, which combines Bharatanatyam and Kathakali dance styles. If Bharatanatyam and Odissi dance-styles are devotional-dominant, then Mohiniyattam

mohiniyattam danceMohiniyattam is a dance form that keeps Malayali art alive, as a symbol of the siren-like appearance of Shringar-dominant Lord Vishnu. Like Kathakali, Mohiniyattam was also saved by the efforts of Mahakavi Vallathol Narayan Menon. The influence of this style was also reduced with the increasing influence of Kathakali and the end of court tradition.

The name of Shri Krishna Panikkar is particularly notable among the gurus of Mohiniyattam. Later, Guru Gopinath, Kalyani Kutty Amma, Guru Kunjanpanikkar, Kochkunji Amma, Shantarao, Raghavan Nair, and his disciple Kanak Rale gave a lot of performance as well as preparing good disciples.

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The various aesthetic forms of Indian classical dance form, given by the evolutionary system and aesthetic expression of the body movements, facial expressions, eye movements also include elements that develop spiritual consciousness along with entertainment, which can be seen in all the above genres.

History and Evolution

Mohiniyattam evolved from the state of Kerala, which also has a connection with the old tradition of the Lasya style of dance. The temple sculptures of the state are early manifestations of Mohiniattam or other similar dance forms. Mohiniyattam Aakritiya is also evident from the various feminine sculptures that adorn the 11th-century Vishnu temple at Trikodithanam, and the Kidangur Subramanya temple.

The obvious fact from the text-based record beginning in the 12th century is that the Lasya theme was incorporated by Malayalam boards and playwrights. The 16th century book called Vyavaharamala ‘written by scholar, poet, writer and astrologer Majhmangalam Narayanan Nambudiri is the first known book to mention the word Mohiniyattam about payment due to a Mohiniyattam dancer.

While discussing various performing art forms of Kerala, the famous poet Kunchan Nambiar has mentioned Mohiniyattam in his 17th-century book ‘Goshala Yatra’. By that time, this dance had emerged as one of the classical art forms of the state. The 18th century Sanskrit treatise Balaram Bharatam, written by the king of Travancore Kartik Thirunal Bala Ram Varma (considered to be an important secondary work on the Natya Shastra) mentions ‘Mohino Natana’ among various other dance arts.

Mohiniyattam has developed as a performing art during the 18th and 19th centuries thanks to the patronage of many princely states. The initiation and preservation of Maharaja, Maharaja of Travancore, Swati Thirunal Ram Varma, himself a poet and prolific music composer, saw the development of a joint team of artists of two genres, namely Bharatanatyam and Mohiniyattam, in the early 19th century. His contribution to the art form saw the eventual development and systematization of the present Mohiniyattam.

Mohiniyattam nritya ka parichay in hindi

तमिलनाडु की देवदासियों और केरल के नंग्यारों के मेल से जो नई नत्य-पद्धति प्रकाश में आई, उसे ‘मोहिनीअट्टम्’ कहा गया। देवदासिया कोमल भाव-भंगिमाओं से युक्त लास्य-प्रधान नृत्य जानती थीं और नम्यार लोग केवल मुखाभिनय में पटु थे, अतः दोनों का सम्मिश्रण होकर मोहिनीअट्रम की कला का आविर्भाव हो गया। 13 से 18-वीं शताब्दी तक देवदासियों का दासीअट्टम् धीरे-धीरे पतनोन्मुख हो गया और देवदासी शब्द वेश्या-सूचक हो गया।

उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ट्रावनकोर (त्रिवेन्द्रम) के महाराजा स्वाति तिरुनाल के द्वारा मोहिनीअट्टम् नृत्य-विधा विशेष प्रकाश में आई उन्होंने इस विधा के लिए 50 पदम् और अनेक वर्णम् भी रचे। केरल प्रदेश के इस नृत्य में दखारी गीत-संगीत की प्रधानता रहती है, जिसमें भरतनाट्यम् और कथकलि नृत्य शैलियों का सम्मिश्रण है। यदि भरतनाट्यम् और ओडिसी नृत्य-शैलियाँ भक्ति-प्रधान हैं, तो मोहिनीअट्टम्

शृंगार-प्रधान। भगवान् विष्णु के मोहिनी रूप के प्रतीक के रूप में मोहिनीअट्टम् मलियाली कला को जीवित रखनेवाली नृत्य-शैली है। कथकलि की भाँति मोहिनीअट्टम् का उद्धार भी महाकवि वल्लथोल नारायण मेनन के प्रयत्नों से हुआ। कथकलि के बढ़ते प्रभाव तथा दरबारी परम्परा समाप्त हो जाने से इस शैली का प्रभाव भी कम हो गया।

मोहिनीअट्टम के गुरुओं में श्रीकृष्ण पणिक्कर का नाम विशेष उल्लेखनीय है। बाद में गुरु गोपीनाथ, कल्याणीकुट्टी अम्मा, गुरु कुंजनपणिक्कर, कोचकुंजी अम्मा, शान्ताराव, राघवन नायर तथा उनकी शिष्या कनक रैले ने अच्छे प्रदर्शन करने के साथ-साथ अच्छे शिष्य तैयार करने में भी बहुत योग दिया।

शारीरिक भंगिमाओं की विकास-प्रणाली और सौन्दर्यपूर्ण अभिव्यक्ति ने भारतीय नृत्य के जो विविध मनोहारी रूप समाज को दिए, उनमें मनोरंजन के साथ आध्यात्मिक चेतना को विकसित करने वाले तत्व भी निहित हैं, जो उपर्युक्त सभी शैलियों में देखे जा सकते हैं

Mohiniyattam nritya ka ithihas in hindi

मोहिनीअट्टम केरल राज्य से विकसित हुआ, जिसमें नृत्य की लासिया शैली की पुरानी परंपरा के साथ एक संबंध भी है। राज्य की मंदिर मूर्तियां मोहिनीअट्टम या इसके समान अन्य नृत्य रूपों की शुरुआती अभिव्यक्तियाँ हैं। मोहिनीअट्टम आकृतिया भी विभिन्न स्त्री मूर्तियों से स्पष्ट हैं जो त्रिकोडीथानम में 11 वीं शताब्दी के विष्णु मंदिर, और किदंगुर सुब्रमण्य मंदिर में सुशोभित हैं।

12 वीं शताब्दी से शुरू होने वाले पाठ-आधारित रिकॉर्ड से स्पष्ट तथ्य यह है कि लासिया विषय को मलयालम बोर्ड और नाटककारों द्वारा शामिल किया गया था। विद्वान, कवि, लेखक और ज्योतिषी मझमंगलम नारायणन नंबुदिरी द्वारा लिखित व्यवाहरमाला ’नामक 16 वीं शताब्दी की पुस्तक पहली ज्ञात पुस्तक है जिसमें मोहिनीअट्टम नर्तक के कारण भुगतान के संबंध में मोहिनीअट्टम शब्द का उल्लेख है।

केरल के विभिन्न प्रदर्शन कला रूपों के बारे में चर्चा करते हुए, प्रसिद्ध कवि कुंचन नांबियार ने अपनी 17 वीं शताब्दी की पुस्तक ‘गोशाला यात्रा’ में मोहिनीअट्टम के बारे में उल्लेख किया है। उस समय तक यह नृत्य राज्य के शास्त्रीय कला रूपों में से एक के रूप में उभरा था। त्रावणकोर कार्तिक थिरुनाल बाला राम वर्मा (नाट्य शास्त्र पर एक महत्वपूर्ण द्वितीयक कार्य माना जाता है) के राजा द्वारा लिखित 18 वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथ बलराम भारतम् ’में विभिन्न अन्य नृत्य शैलियों के बीच‘ मोहिनो नाटाना ’का उल्लेख है।

मोहिनीअट्टम 18 वीं और 19 वीं शताब्दी के दौरान एक प्रदर्शन कला के रूप में विकसित हुआ, जो कई रियासतों के संरक्षण के लिए धन्यवाद था। त्रावणकोर के महाराजा महाराजा की दीक्षा और संरक्षण, स्वति थिरुनल राम वर्मा, खुद कवि और शानदार संगीत रचनाकार, 19 वीं सदी की शुरुआत में, भरतनाट्यम और मोहिनीअट्टम नामक दो जीनरों के कलाकारों की एक संयुक्त टीम का विकास देखा। कला के रूप में उनके योगदान ने वर्तमान के मोहिनीअट्टम के अंतिम विकास और व्यवस्थितकरण को देखा।

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