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Natan ke bhed in kathak

Natan ke bhed in kathak English

we will know the distinction of Natan (Natan ke bhed ) as shown in the book Abhinadarpan written by ancient scriptures and Acharya Nandikeshwar ji. In the ancient scriptures, three distinctions of Natan have been told.

  • Natya – Theatrical
  • Nritta – Pure dance
  • Nritya – Dance with emotion

Natya – Theatrical – ( Natan ke bhed )

The simplest meaning of the play is to do drama. When the actor mimics each step of a historical character apart from himself, the manner of speaking, the manner of speech, the costumes, etc., then it is said that it should be known that any simple imitation (copying) is not a drama. Can say For example, if a child imitates the face or dialect of another child so that people laugh for a moment, then we cannot do it theatrically. Because artistic manifestations involving acting and acting in dramas or dramas are necessary. Because this drama is seen, it is also called Roop this metaphor. Natya, Rup ,Rupa is the name of all three object.

Avasthanukritinatyam rupam dishyatyochyate,
Rupakam tatsamaropato Dushadheva Rasashrayam.

The transitions of the stage are called Natya (drama) theatrical. Having a visible value is called a form. Having similarities, it is called metaphor and there are 10 types of drama from the shelter of rasa. Natya is the best of the three distinctions of verbs of Natan. In Kathak dance, the gatbhav is also considered to be Natya (theatrical).

Nritta ( pure dance) –  ( Natan ke bhed )

Nritta, a verb that is expressionless (bhavaabhinay se rahit) in Natan. It is called Nritta. As written in the Abhinaya Darpan.

“bhaavaabhinayaheenan nrittamityabhidheeyate”

In this dance, the predominance of the rhythm of the rhythm is more like it is said Nritya Tal Lyashrayam. According to this primacy, when different types of rhythm and rhythm are performed by organ operation, the same performance is called nritta. Emotion is not performed in this dance. For this reason, it is also called pure dance. Shivaji’s ‘Tandava’ is also basically a dance, so these dances are the most ancient in human art form.

Bharata Muni has told in full detail in the Natyasastra that in the Natya I have been told in detail how and where this dance should be planned. Therefore, this dance drama is going to enhance. This dance is considered very auspicious and for this reason, the dance is performed on all auspicious occasions. Such as marriages, son-births, city or planetary entry, visit of the deity idol, coronation, festival and etc. are performed in the Auspicious days. Thats, tukda, paran, tatkaar, etc. that go to Kathak dance are considered under this dance.

Nritya (combination of Natya & nritta) –  ( Natan ke bhed )

This art was born from the union of both the Natya and Nritta arts, so we call it nritya. This dance is composed of rasas and expressions, as stated in Abhinaya Darpan.

“Rasbhavavyanjnadityukayan Nrityamitriyate”

But it has a predominance of emotions as it is eaten in the decipherment.

“Other Bhavashrayan Nritya”

It is based on emotion, in fact, in this dance process, displaying the emotions is done by moving the limbs according to the rhythm. Acharya Nandikeshwar ji has told how the dance is described very beautifully.

Asenalambyade Geetam Hastenartha Pardeshte.
Netrabhyana darsheed bhavam padabhyam talamacharet.

When he sings a song with a mouth. Explain the meaning of the words of that song with the help of the hands. Let the eyes show his expressions and the feet are pushed according to the rhythm, then we call it Nritya ( dance). ‌ Nritya is the most attractive and most difficult of the three distinctions of the action of Natan ( Natan ke bhed ). Thumri in the Kathak style, singing Bhajan a verse here, if we can display the sentiment, then we can call it continual.

Natya , nritta and nritya is a development in all three. It is only by the gradual performance of these three that Natan (Nartan) attains perfection. These natan distinctions can be seen in different performances in each of the classical dance styles of India.

Natan ke Bhed in kathak Hindi / नटन के भेद (नर्तन के भेद )

हम जानेगे नटन के भेद जैसा की प्राचीन शास्त्रो व् आचार्य नंदिकेश्वर जी के द्वारा लिखित पुस्तक अभिनयादर्पण में नटन के भेद को दर्शाया गया है। प्राचीन शास्त्रो में नटन के तीन भेद बतलाये गए हैं –

  • नाट्य
  • नृत्त
  • नृत्य

नाट्य

 नाट्य का सादारण अर्थ नाटक करना है। जब अभिनेता अपने से पृथक किसी ऐतिहासिक पात्र की चल ढल ,बोलने का ढंग ,वेशभूषा आदि प्रत्येक अवस्था का नकल करके प्रस्तुत करता है तो तब वह नाट्य कहा जाता है यह बात जान लेना चाहिए कि किसी भी साधारण अनुकरण ( नकल )को हम नाट्य नहीं कह सकते । जैसे कि यदि कोई बालक किसी और बालक की मुखाकृति या बोली का अनुकरण करता है जिससे कि लोग पल भर हंस पड़े तब इसे हम नाट्य नहीं कर सकते । क्योंकि नाट्य या नाटक मैं आंगिक आदि अभिनय भेदो से युक्त कलात्मक अभिव्यक्ति आवश्यक होती है। क्योंकि इस नाटक को देखा जाता है इसलिए इसे रूप यह रूपक भी कहा जाता है ‌। नाट्य रूप रूपा तीनों एक ही वस्तु के नाम है। 
 

अवस्थानुकृतिनाट्यम रूपम दृश्यतयोच्यते।
 रूपकं तत्समारोपात दशधेव रसाश्रयं।।

 
अवस्था के अनुकृति को नाट्य कहा जाता है। दृश्य मान होने से उसे रूप कहा जाता है। समानता होने से यह रूपक कहलाता है और रस के आश्रय से नाट्य के 10 प्रकार होते हैं। नाट्य नटन क्रियाओं के तीनों भेदों में सर्वश्रेष्ठ हैं । कथक नृत्य में गत-भाव भी नाट्य के अंतर्गत ही माना जाता है। 

नृत्त 

नृत्त,नटन मे भावाभिनय से रहित जो क्रिया होती है । उसे नृत्त कहा जाता है। जैसे कि अभिनय दर्पण में लिखा गया है
 

 “भावाभिनयहीनं नृत्तमित्यभिधीयते” 

 
इस नृत्य में लय ताल की प्रधानता ज्यादा रहती है जैसे कि कहा गया है नृतं ताल लयाश्रयम । इसी प्रधानता के अनुसार जब ताल और लय के विभिन्न प्रकार को अंग संचालन के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है तब उसी प्रदर्शित क्रिया को नृत्त कहा जाता है । इस नृत्त में भाव का प्रदर्शन नहीं किया जाता है । इसी कारण से इसे शुद्ध नृत्य भी कहते हैं। शिवजी का ‘तांडव’ भी मूलतः नृत्त ही है इसलिए यह नृत्त मानवीय कला रूप में सबसे प्राचीन हैं । 
                         
 भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में पुरे विस्तार से बतलाया है की नाट्य मैं इस नृत्त की योजना कहां-कहां वह किस प्रकार से की जानी चाहिए यह विस्तार से बताया गया है। इसलिए यह नृत्त नाट्य शोभा बढ़ाने वाला है। यह नृत्त अत्यंत शुभ माना जाता है इसी कारण से समस्त शुभ अवसरों पर नृत्त किया जाता है। जैसे कि विवाह, पुत्र-जन्म ,नगर या ग्रह प्रवेश ,देव मूर्ति की यात्रा ,राज्याभिषेक , महोत्सव और आदि मंगल कार्यों में आवश्यक रूप से किया जाता हैं। कथक नृत्य में नासिक जाने वाली ठाट, टुकड़े ,परन, ततकार आदि इसी नृत्य के अंतर्गत माने जाते हैं। 

नृत्य  

नाट्य और नृत्त इन दोनों कलाओं के मिलन से यह कला का जन्म हुआ इसलिए इसे हम नृत्य कहते हैं । यह नृत्य रस और भावो की अभीव्यंजना से युक्त होता है जैसा कि अभिनय दर्पण में कहा गया है ‌। 
 

” रस्भावव्यंजनादित्युक्तं नृत्यमितीर्यते ” 

 
 किन्तु इसमें भावो की ही प्रधानता होती है जैसा की दशरूपक में खा गया है ‌।  
 

 ” अन्यद भावाश्रयं नृत्यं ” 

 
भाव पर आधारित होता है वस्तुतः ताल लय के अनुसार अंगों का संचालन करते हुए भावों को प्रदर्शित करना इस नृत्य क्रिया में की जाता है। आचार्य नंदीकेश्वर जी ने बतलाया है कि नृत्य का बहुत सुंदर वर्णन किस प्रकार किया जाता है।

 आस्येनालम्ब्येद गीतम हस्तेनार्थ प्रदर्श्यते।
 नेत्राभ्यां दर्शयेद भावं पादाभ्यां तालमाचरेत।।

 
जब वह मुंह से गाना गाय । हाथों की मुद्रा से उस गीत के शब्दों का अर्थ बताएं। आंखों से उसके भाव दिखलाए और पैरों को ताल के अनुसार ठोक दिया जाए, तब हम उसे नृत्य कहते हैं। ‌ नृत्य नटन क्रिया के तीनों भेदो में आकर्षक और सबसे कठिन होता है। कत्थक शैली में ठुमरी, भजन यहां कोई पद गाते हुए भाव का प्रदर्शन किया जाए तो उसे हम नित्य कह सकते है। 
 
नाट्य ,नृत्त व् नृत्य इन तीनों में एक विकास क्रम है। इन तीनों के क्रमिक प्रदर्शन से ही नटन (नर्तन) को पूर्णता प्राप्त होती है । भारत की प्रत्येक शास्त्रीय नृत्य शैलियों में इन नटन भेदों को अलग-अलग प्रदर्शित होते देखा जा सकता है 
 

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