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Jaipur Gharana Kathak Dance in Hindi

Jaipur Gharana kathak Dance

Kathak dance in Jaipur Gharana has come from Rajasthani tradition. Its dancers have been mostly associated with the courts of Hindu kings, so on the other hand, the old and ancient traditions of Kathak dance are still safe in the Jaipur Gharana. According to the interest of the Nawabs, their dance shows faster preparation and more enthusiasm. Even in the most difficult locks of Pakhavaj, he dances comfortably and very easily. The performance of the Difficult Tatkaars and rhythms (Laykaari) composed by them is very famous.

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In the Jaipur Gharana, the attention is on the footwork, not as much as on the hand. Apart from dance, the use of various types of lyrics like Kavit, Tabla Pakhawaj, Primalu, Jatiparan, etc. is the specialty of this house, it has more primacy of sentiment and it has been showing maximum Thumri ,Bhajans and expressions on verses.

History Of Jaipur Gharana

Bhanu Pratap Ji started the Jaipur Gharana about 150 years ago. He was from the Shiva sect and he learned Tandava dance from a saint. His son was Malu Ji. Those who learned from their father gave dance education to their two sons Lalu Ji and Kanha Ji. Kanha ji went to Vrindavan to study Natwari dance and had two sons, Gidda Ji and Sahaji Ji. The first son learned Tandava dance and the second son got a special qualification in Lasya Anga.

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Gidda Ji had 5 sons, out of which Shri Dulha Ji, also known as Girdhari Ji. He gained special fame in the field of dance, having equal rights in Tandava and Lasaya. Then they came and settled in Jaipur, they had two sons. Shri Harihar Prasad and Hanuman Prasad were both proficient in dance and were employed in the Gunjikhanan of Jaipur. At the time when the pair of Kalka Bindadin was becoming famous in Lucknow, at the same time in Jaipur, the pair of these two brothers was famous by the name ‘Dev-Pari Ki Jodi’. Hanuman Prasad ji had three sons, Shri Mohanlal ji, Chiranjilal ji and Narayan Prasad ji.

Pandit Narayana Prasad Ji has been counted among the representative dancers of this era. His two sons, Shiv Charan Girdhar (Chand) and Tej Prakash (Suraj) aka Tulsi, also indulged in the practice of dance according to their ancestral tradition. Thus it continued from the Guru Shishya tradition of the Jaipur Gharana to the Gangani family as we know that Shri Rajendra Gangani Ji is still following the Guru Shishya tradition.The history of Lucknow Gharana is like this.

Jaipur Gharana Kathak Dance in Hindi / जयपुर घराना (कथक के घराने)

नमस्कार आज हम जानेगे जयपुर घराने के बारे में जयपुर घराने में कथक नृत्य राजस्थानी परंपरा से आया है इसके नर्तक अधिकांशतः हिंदू राजाओं के दरबारों से सम्बद्ध रहा हे अतः वहीं दूसरी ओर कत्थक नृत्य की पुरानी व प्राचीन परंपराएं जयपुर घराने में अभी तक सुरक्षित है। नवाबों की रूचि के अनुसार इनके नृत्यौमें तेजी तैयारी व अधिक जोश दिखाई देता है। पखावज की मुश्किल से मुश्किल तालों में भी यह आराम से व अत्यंत सरलता से नाच लेते है। इनके द्वारा रचित कठिन तत्कार व लयकारियों का प्रदर्शन अत्यंत प्रसिद्ध है ।
इस घराने में जितना ध्यान पैरों पर दिया जाता है उतना हस्तकों पर नहीं । नृत्य के अलावा कवित्त ,तबला पखवाज के बोल, प्रिम्लू, जातिपरन आदि अनेक प्रकार के बोलों का प्रयोग इस घराने की विशेषता है इनमें भाव की प्रधानता अधिक है और यह अधिकतम ठुमरी भजन तथा पदों पर भाव प्रदर्शित करते रहे हैं ।

जयपुर घराना का इतिहास

जयपुर घराने का प्रारंभ आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व भानु प्रताप जी ने की थी। भानु जी शिव संप्रदाय से थे और उन्होंने तांडव नृत्य की शिक्षा किसी संत से ली,भानु जी के पुत्र मालू जी थे। जिन्होंने अपने पिता से सीखी हुई,नृत्य शिक्षा अपने दोनों पुत्र लालू जी और कान्हा जी को प्रधान की। कानू जी ने वृंदावन जाकर नटवारी नृत्य की शिक्षा प्राप्त की और इनके दो पुत्र थे गिद्दा जी तथा सहजाजी थ।पहले पुत्र ने तांडव नृत्य सीखा तथा दूसरे पुत्र ने लास्य अंग में विशेष योग्यता प्राप्त की।

गिद्दाजी के 5 पुत्र थे जिनमें से श्री दूल्हा जी जिन्हें गिरधारी जी भी कहा जाता है। उन्होंने नृत्य के क्षेत्र में विशेष प्रसिद्धि प्राप्त की,यह तांडव और लासय में समान अधिकार रखते है। फिर वे जयपुर आकर बस गए थे ,उनके दो पुत्र थे। श्री हरिहर प्रसाद व हनुमान प्रसाद यह दोनों ही नृत्य कला में प्रवीण थे और जयपुर के गुणीजनखाने में नियुक्त थे। जिस समय लखनऊ में कालका बिन्दादीन की जोड़ी मशहूर हो रही थी, उसी समय जयपुर में इन दोनों भाइयों की जोड़ी ‘देव-परी की जोड़ी’ नाम से प्रसिद्ध थे। हनुमान प्रसाद जी के तीन पुत्र हुए श्री मोहनलाल जी, चिरंजीलाल जी तथा नारायण प्रसाद जी।

पंडित नारायण प्रसाद जी की गिनती इस युग के प्रतिनिधि नृत्यकारों में रही है। उनके दो पुत्र शिवचरण गिरधर (चांद) और तेज प्रकाश (सूरज) उर्फ तुलसी भी अपनी पेतृक परम्परानुसार नृत्य की साधना में लीन रहे। इस प्रकार यह जयपुर घराने की गुरु शिष्य परंपरा से गंगानी परिवार तक चलती रही जैसे की हम जानते है श्री राजेंद्र गंगानी जी आज भी गुरु शिष्य परंपरा को निभा रहे है| जयपुर घराने का इतिहास कुछ इस प्रकार है |

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