Menu Close

Kathak Dance Banaras Gharana in Hindi

Kathak Dance Banaras Gharana

Banaras Gharana is based on pure dance lyrics, satvic gestures, and tatkar. In this gharana, the extraction of the bolo from the feet of dance was of special importance. where others used to hit four feet in Tigda Dig Dig where they used to hit six feet.In this gharana, the tatkar was done with heel and less attention was paid to tode or tukde .But whatever he presented was difficult to pay with the right form, gasture, legs. In this Gharana, the purity of sentiment and the chakradar gait are very beautiful.

Kathak Dance Banaras Gharana

Janki Prasad Gharana

The third Gharana of Kathak dance is the Banaras Gharana. This Gharana is also famous for the “Janki Prasad Gharana”. Janki Prasad Ji was a resident of Varanasi and was probably the brother of the well-known tabla player Pandit Ramsahaji. During his time, the famous Shri Hukamaram of Rajasthan came to Varanasi with his boy Chunnilal. At that time, Chunnilal used to perform some folk dances like a girl. Seeing his talent, Janaki Prasad kept Chunnilal with him and taught Kathak dance for fifteen years. Then Chunnilal Ji, after returning from Benares, was appointed in the court of Bikaner and taught his younger brother Dulharam to dance. Ganeshprasad Ji took the education of Kathak dance from Dulharam Ji.

Handmade Doll Store

Handemade Dolls
Kathak Dance Doll Buy Now

The DulhaRam Ji had three sons, Bihari Lal, Hiralal, and Puranlal. Similarly, Ganeshprasad Ji also had three sons, Hanuman Prasad, Shivlal, and Pandit Gopal Ji. All of them were the best dancers of their time. Pandit Gopal Ji also received his dance education from Shri Shambhu Maharaj Ji of Lucknow. It is also believed that this Gharana belongs to the oldest ‘Sanvaldas Gharana of Rajasthan and Janki Prasad Ji was the only descendant of Shyamal Das Ji who had settled in Benaras.The history of the Banaras Gharana is like this.

Kathak Dance Banaras Gharana in Hindi / बनारस घराना (कथक के घराने)

बनारस घराना शुद्ध नृत्य के बोल, सात्विक भाव तथा तत्कार पर आधारित है। इस घराने में नृत्य के बोलो की पैरों से निकासी का विशेष महत्व था ,जहां अन्य लोग तिग्दा दिग दिग में चार पैर मारते थे वहां यह लोग छे पैर मारते थे। इस घराने में तत्कार को एड़ी से किया जाता था और इसमें तोड़ो टुकड़ो पर कम ध्यान दिया जाता था। लेकिन जो भी वह पेश करते सही ढंग,अंग,पैरों से अदा करना बहुत मुश्किल था। इस घराने में भाव की शुद्धता और चक्रदार गते बहुत शोभायमान देखने को मिलते हैं।

जानकी प्रसाद घराना

कथक नृत्य का तीसरा घराना बनारस घराना है यह घराना “जानकी प्रसाद घराना” से भी प्रसिद्ध है । जानकी प्रसाद जी वाराणसी निवासी थे और संभवतः सुप्रसिद्ध तबला वादक पंडित रामसहाय जी के भाई थे। इनके समय में राजस्थान के प्रसिद्ध श्री हुकमराम जी अपने लड़के चुन्नीलाल के साथ घूमते हुए वाराणसी आए । उस समय चुन्नीलाल लड़की बनकर कुछ लोक नृत्य की प्रस्तुति किया करते थे। उनकी प्रतिभा देखकर जानकी प्रसाद जी ने चुन्नीलाल को अपने पास ही रख लिया और कथक नृत्य की शिक्षा पंद्रह वर्ष तक दी। फिर चुन्नीलाल जी बनारस से लौटने पर बीकानेर के दरबार में नियुक्त हुए और अपने छोटे भाई दूल्हाराम को नृत्य की शिक्षा दी। दुल्हाराम जी से गणेशीप्रसाद जी ने कथक नृत्य की शिक्षा ली।

दूल्हा राम जी के तीन पुत्र हुए बिहारीलाल, हीरालाल व पूरनलाल। इसी प्रकार उधर गणेशीप्रसाद जी के भी तीन पुत्र हुए हनुमान प्रसाद, शिवलाल तथा पंडित गोपाल जी। यह सभी अपने समय के सर्वश्रेष्ठ नर्तक रहे। पंडित गोपाल जी ने अपनी नृत्य की शिक्षा लखनऊ के श्री शम्भू महाराज जी से भी प्राप्त की थी। ऐसा भी माना जाता है कि यह घराना राजस्थान के सबसे प्राचीन ‘सांवलदास घराने’ से संबंध रखता है और जानकी प्रसाद जी श्यामल दास जी के ही वंशज थे जो की बनारस जा बसे थे। बनारस घराने का इतिहास कुछ इस तरह है।

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.